यह कैसा गोरख धंधा है
अंधे को ले चला अंधा है,
‘राजा’ को इसने महल दिया
रोटी को तरसे बंदा है I
यहाँ पैसे वाले एक हुए
धन के बल पर नेक हुए,
मिलजुल कर सब मौज उड़ाते
शर्म बेच कर ‘फेक’ हुए I
हड़प लिये करोड़ों गप से
जरा डकार नहीं लेते,
अरबों तक जा पहुंची बोली
बस बेचे देश को देते I
है जनता भोली विश्वासी
थोड़े में ही संतोष करे
सौंप दी किस्मत जिन हाथों में
वे सारे अपनी जेब भरें I
सदा यही होता है आया
कुछ खट-खट कर श्रम करते
कुछ शातिर बन जाते शासक
बस पैसों में खेला करते I
जागें अब भी कुछ तो सोचें
अपनी किस्मत खुद ही बदलें
जेल ही जिनका असली घर है
ऐसे ‘राजाओं’ से बच निकलें I

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