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Padebaba

Sunday, May 1, 2011

1:   ‎"कोई कब तक महज़ सोचे कोई कब तक महज़ गाये ?
इलाही क्या ये मुमकिन है कि कुछ ऐसा भी हो जाये ?
मेरा महताब उसकी रात के आग़ोश में पिघले
मैं उसकी नींद में जागूं वो मुझमे घुल के सो जाये ..."



2:  ‎"तुम्हारे पास हूँ लेकिन जो दूरी है समझता हूँ
तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है समझता हूँ
तुम्हे मै भूल जाऊँगा ये मुमकिन है नही लेकिन
तुम्ही को भूलना सबसे ज़रूरी है समझता हूँ"



3: जिन की आखों में सपने हैं,होठों पर अंगारें हैं ,
जिन के जीवन-मृग पूँजी की क्रीडाओं ने मारे हैं,
जिन के दिन और रात रखें हैं गिरवीं साहूकारों पर,
जिन का लाल रक्त फैला है संसद की दीवारों पर,
मैं उन की चुप्पी को अब हुँकार बनाने वाला हूँ .
मैं उन की हर सिसकी को ललकार बनाने वाला हूँ ...



4: ‎"कलम को ख़ून में खुद के डुबोता हूँ तो हँगामा,
गिरेबाँ अपना आँसू में भिगोता हूँ तो हँगामा,
नहीं मुझ पर भी जो खुद की खबर वो हैं ज़माने पर,
मैं हँसता हूँ तो हँगामा,मैं रोता हूँ तो हँगामा ...."

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