फूल, बस खिलना जानता है !
उसे शुभ घड़ी, शुभ दिन की चाह नहीं
सम्पूर्ण हो जाने के बाद वह
खुदबखुद आँखें खोल देता है...
पांखुरी-पांखुरी खिलता हुआ, अर्पित करता है सुगंध
निस्सीम गगन, उन्मुक्त पवन और धरा के नाम
वह कुछ भी बचाकर नहीं रखता
मुस्कान, रंग और गंध देकर
चुपचाप झर जाता है !
मोहलत नहीं मांगता
क्योंकि वह दाता है, भिक्षुक नहीं
फूल में सौंदर्य है, दर्प नहीं
फूल में औदार्य है, लोभ नहीं
फूल सहज है, जीवन और मृत्यु दोनों में सहज
वह सूरज का ताप और शीत की मार दोनों सहता है
उलाहना नहीं देता
सिफारिश नहीं करता कि उसे राज वाटिका चाहिए
जंगल का एकांत नहीं
उसे निहारो या उपेक्षा करो, वह गांठ नहीं बांधता
देवालय या मरघट दोनों पर चढ़ता है
फूल बस खिलना जानता है !

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